श्री शनिदेव मंदिर संस्थान आप सभी भक्तों का स्वागत करता है. अपनी श्रद्धा लेकर आइए और शनिदेव के पावन चरणों में शीश नवाइए

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श्री शनिदेव कथा

कर्मफलदाता भगवान श्री शनिदेव का प्राकट्य, अलौकिक महिमा, साढ़ेसाती व ढैय्या का आध्यात्मिक रहस्य एवं शास्त्रोक्त वैदिक शांति उपाय।

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ग्रह शांति एवं दोष निवारण

100 %

शास्त्रोक्त वैदिक अनुष्ठान एवं विधिवत पूजन द्वारा शनि साढ़ेसाती व ग्रह दोषों का प्रामाणिक समाधान।

भगवान श्री शनिदेव का प्राकट्य एवं पौराणिक कथा

स्कंद पुराण एवं सौर पुराण के अनुसार, भगवान शनिदेव का प्राकट्य सूर्यदेव और माता छाया (संवर्णा) के पावन तप से हुआ। गर्भकाल के दौरान माता छाया भगवान देवाधिदेव महादेव की कठोर तपस्या में लीन थीं। कठिन उपवास और सूर्यदेव के प्रचंड ताप के प्रभाव से गर्भस्थ बालक का वर्ण श्याम (काला) हो गया।

बालक के प्राकट्य उपरांत जब सूर्यदेव ने उनके श्याम वर्ण को देखा, तो उन्होंने संदेह व्यक्त किया। इस पर बालक शनिदेव ने अपने पिता की ओर क्रोधपूर्ण दृष्टि डाली, जिससे सूर्यदेव का तेजस्वी शरीर भी कुछ समय के लिए निष्प्रभ (काला) हो गया। आगे चलकर शनिदेव ने गोकर्ण तीर्थ में भगवान शिव की युगों तक घोर तपस्या की। उनकी निष्ठा, तप और अडिग न्याय-भाव से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें नवग्रहों में सर्वोच्च दंडाधिकारी एवं कर्मफलदाता का पद प्रदान किया।

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॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

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॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

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॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

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॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

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॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

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॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

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॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

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॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

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श्री हनुमान जी का अभय वरदान

रामायण कालीन कथा के अनुसार, जब लंकापति रावण ने नवग्रहों को अपने सिंहासन के नीचे उल्टा बंदी बना रखा था, तब श्री हनुमान जी ने लंका दहन के समय शनिदेव को रावण के बंधन से मुक्त कराया। युद्ध के कारण शनिदेव के शरीर में हुई असहनीय पीड़ा को शांत करने हेतु पवनपुत्र ने उन पर सरसों का तेल लगाया। शनिदेव ने अत्यंत प्रसन्न होकर वचन दिया कि "जो भी भक्त श्री हनुमान जी की आराधना करेगा, सुंदरकांड/चालीसा का पाठ करेगा और मुझ पर भक्तिभाव से तेल अर्पित करेगा, उसे मेरी पीड़ा से सदा मुक्ति मिलेगी।"

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भगवान शनिदेव के वरदान अनुसार जो भक्त संकटमोचन श्री हनुमान जी के शरणागत रहते हैं, उन्हें शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के दौरान किसी भी प्रकार का भय अथवा अनिष्ट नहीं सताता। हनुमान जी की भक्ति से नवग्रहों की प्रतिकूलता भी अनुकूलता में बदल जाती है।

सुंदरकांड एवं शनि चालीसा पाठ : प्रत्येक शनिवार श्री शनि चालीसा पाठ एवं श्री हनुमान चालीसा या संगीतमय सुंदरकांड का पाठ करने से समस्त ग्रह बाधाएं स्वतः शांत हो जाती हैं।
सिंदूर एवं तैल अर्पण : हनुमान जी को चमेली का तेल व सिंदूर तथा शनिदेव को शुद्ध सरसों का तेल अर्पित करने से मानसिक शांति व रोगमुक्ति मिलती है।
सदाचार व निर्भयता : बजरंगबली की नित्य आराधना से साधक में आत्मबल, अनुशासन, निर्भयता और धर्मनिष्ठ आचरण का संचार होता है।

शनिदेव न्याय के अधिपति हैं, अतः केवल पूजा ही नहीं बल्कि अपने आचरण को शुद्ध रखना भी अनिवार्य है:

श्रमिकों व असहायों का सम्मान : निर्बल, वृद्ध, दिव्यांग और अपने अधीन कार्य करने वाले श्रमिकों के साथ सदैव न्यायपूर्ण व दयालु व्यवहार करें।
शनिवार दीपदान व जप : शनिवार सूर्यास्त उपरांत पीपल के नीचे सरसों के तेल का चौमुखा दीपक जलाएं और ॐ शं शनैश्चराय नमः का जप करें।
अहंकार व छल का त्याग : असत्य, परपीड़ा और अधर्म से दूर रहें; सत्कर्म ही शनिदेव का सर्वोत्तम उपाय है।